Wednesday, August 13, 2014

ग़ज़ल

    चाँद   तनहा  है, आसमा   तनहा 
    चाँद तनहा है , आसमा तनहा .....
     
   बात निकली है जो दिल की तो दिल भी तनहा है |
     चाँद तनहा है .................
  
  इश्क की राह पर 
  चल रहे है जो कदम ,
  चल रहे है साथ मगर फीर भी तनहा .......         
 चाँद तनहा है ............
 आज भी हुश्न को देखकर 
  शायरी कहते है क्या ?
  अब तो ग़ालिब की हवेली में 
  ग़ालिब तनहा ............
 चाँद तनहा है ...........
  ओश की बूंद पर
 गर्म रेतो के निशा.......
तप रही है जम़ी प्यार की , 
 और     ख्वाईशे  तनहा ...... 
              
    चाँद   तनहा  है, आसमा   तनहा 
    चाँद तनहा है ,

Friday, October 12, 2012


"क्या होगा क्या होगा "

धरती तों बट जाएगी पर नीलगगन का क्या होगा ,
पानी पानी लेते रहोगे तों पानी की प्यास का क्या होगा
कब तक खेलतें रहोगें संपदा - ऐ   धरती से
जब खेलने को उकलाई संपदा तों
धरती वासियों तुम्हारा क्या होगा

खूब कर रहें हम विज्ञान  विज्ञान  हैं
तकनिकी इजात पे कितना अभिमान हैं
लेकिन क्या ये भी तुम्हें गुमान  हैं
हर तकनिकी साधन को इंसानी हाथ का इंतजार है
हवां ,पानी और आकाश गंगा के बिना ,
इंसानी दिमाग तेरी क्या पहचान हैं !
किसी को पेट में अनाज की आग है
और अधिक्तम घरों में सड़ता  अनाज  कर रहा विकराल हैं
जब वादियों का सारा धन यु ही होता रहा बर्बाद
 तों आने वाली  नस्लों  का  क्या होगा! 

सूरदास ,कबिरदास के दोहों से
खतम कर रहा समाज अपनी जानपहचान हैं
क्या कोला , पिज्जा मिक्की माउस से ही
ज्ञान्वर्धित हो कर बाल जगत 
दे पायेगा सांसद को  का सही पहचान    
जब संस्कृति से हम हो रहे दूर हैं
तों भारत में लगे महान शब्द का क्या  होगा  

आपदाओं की  बिगड़ती शक्ल कर रही ऐलान हैं
जाने अभी कितनी हैं ऐसी आपदायें
 जिनकी शक्लों सूरत से हम  अनजान हैं 
धरती तों हो ही रही हैं त्राहिमाम 
अब चाँद पर भी  है कहर की बारी 
जाने  बर्फिलें दुतों अब तुम्हारा क्या होगा 

हम कर तो रहे है धन अर्जित
लेकिन  जब  उठ जाएँगी संपदा की डोली तों 
पूंजीपतियों  तुम्हारा क्या होगा ...

हैं वक्त अभी भी सचेत लों 

चिंतन विन्तन  करके नगर  ढिढोरा पिटों ......
समझों इसे आकाशवाणी "क्या होगा क्या होगा "

 आओं संपदा की बैंक में जीवन जीवंत रहें विमां का अभियान चलायें !!

Sunday, July 15, 2012


             गजल

 मुझको देख  कर उसने नायाब  कर  दिया .....
चन्द  शब्द से  मुझे किताब कर दिया ..
मेरी चाहतों के हवाले से .... 
जो छायें लाल बादल  उसकी आँखों में .......

 आँखों से आँखों को शराब कर दिया ...

मुझको देख कर उसने नायाब  कर दिया ...

चाहता है वो मुझे  ये राह  भी  धुंध में है ...
तो भी उसकी कसक  ने  शामें -ग़ज़ल  को शबाब कर  दिया . 
धीमें धीमें  से  नब्ज़ में घुलती है सांसें उसकी ...
और मेरी चुड़ियों की खनक में बस कर ,,  

 हर   खनक को  बेमिशाल कर दिया ...

 मुझको देख  कर उसने नायाब  कर  दिया .....
चन्द  शब्द से  मुझे किताब कर दिया ..


 यु अधेंरों में जब भी रौशिनी तरासी हमने ...
 कसम तेरे खुमारी की एक नही सौं चराग जल गये ।

 और मेरी वफा ने अब , तेरी बेवफाईयों का हिसाब कर दिया 

मुझको देख  कर उसने नायाब  कर  दिया .....
 चन्द  शब्द से  मुझे किताब कर दिया ..


****************             ****************



Monday, June 18, 2012


                                               ये जो तुम्हारा मैं 


ये जो तुम और तुम्हारा मैं है , जरा सोचों कितना विशाल है ।

  तुम्हे किसी और की नही; खुद की जरुरत है....

  न जाओं   तुम कही  और ...बस थोरा थम लो,

            आपने ही मन के छाव में।









  माना  की हर मन में सारगर नही निखर सकता ,

  पर पनघट  की घुंघट  में कुमकुम तो सजा ही सकते हो ,

     किनारे पर जब भी राहगीर तुम्हे पगडंडियों  की राह  दिखाये,

      तो तुम अपनी कुमकुम से रंगोलियों की पथ सजा लेना ।

     

क्यों बस युही बिता देते हो जीवन रिश्तों की छन्नी में ?

 

  कुछ और भीतो  है तेरे अन्तरमन  में"

        पहले तो आपना आपा झाकियें  ........

  

   फिर मिलियें खुद से की आप हैं कौन? 

 

पूरी दुनिया न सही - एक आसमान   तो खुद को दिजीयें।

 

मैं जब जब  गिरुगा तो खुद को फिर से खड़ा कर लुगा ,

 

 ये तो अब मैं ,मेरे मैं से मिल चूका हु ....

 तो सोचुगा  नही  ,रुकुगा नही बस चलता जाऊँगा  .....

 

क्यों की मुझे पता हैं की एक छितिज  है जो मेरा है 

  मैं  जैसा भी हु  वैसा ही सही 

 

              हैं आगांज ये,,   


की मैं  भी धरती तुझे कुछ देकर ही  अपने रुक्सद का फरमान लुँगा    

                   तो आओं जितने भी मैं हैं हम   

                     'ये मंथन का मंच बनायें'

 

          जो भी हैं उसी से खुद को निखारें 

                 और 

       अपनी गुणों की एक एक वाटिका बनायें ।            

Source : its my own thought

Wednesday, April 27, 2011

"जरा तय तो कर लो ".

 जरा तय तो कर लो , किसकी चाहत है तुम्हें?
जिसकी  खातीर चल पड़े हो, पगडंडी से होकर कोरी सड़क पर ,
हर लम्हा आपने जीवन का,  बिता  रहें हो ऐसे ........
                                                                  जैसे  थका  घोड़ा  रेस का !
   जरा तय तो कर लो किसकी चाहत है तुम्
               अच्छा छोडों, एक सवाल है जो जरा खुद से पुछो ??
        सुबह की  किरणों से लेकर,रात के फैले काजल तक "'
                                  ये जो तुम्हारी पलके हैं ,
                कब -कब मुस्कान से झपकती हैं?
                          अगर ऐसा नही है तो,,
 किसकी चाहत में तुम बनो हो रेस का घोड़ा  .........??
             अरे जरा सोचों चाहत उसकी करो ...........
जिसकी मंजिल का दामन तुम सजा सको !
                जिसका किनारा न हो वो चाहत नही .............लालच है !
तो जरा रुको यू ही न ये जीवन बर्बाद करो .............
                         खुद भी हसो औरों को भी हसने दो ............
ख़ुशी के नगमो से ये जीवन की बगिया सजने दो ,
                        चाहत उतनी की करो ! 
जिसमें  तुम और तुम्हारे कुटुम जी सकें ..........
                 वो चाहत क्यों करते हो जिसका अंत ही नही .......
आवों जरा तय तो  कर लो ...........
                           किसकी चाहत है और क्यों ??

"जरा तय तो कर लो ".

 जरा तय तो कर लो , किसकी चाहत है तुम्हें?
जिसकी  खातीर चल पड़े हो, पगडंडी से होकर कोरी सड़क पर ,
हर लम्हा आपने जीवन का,  बिता  रहें हो ऐसे ........
                                                                  जैसे  थका  घोड़ा  रेस का !
   जरा तय तो कर लो किसकी चाहत है तुम्
               अच्छा छोडों, एक सवाल है जो जरा खुद से पुछो ??
        सुबह की  किरणों से लेकर,रात के फैले काजल तक "'
                                  ये जो तुम्हारी पलके हैं ,
                कब -कब मुस्कान से झपकती हैं?
                          अगर ऐसा नही है तो,,
 किसकी चाहत में तुम बनो हो रेस का घोड़ा  .........??
             अरे जरा सोचों चाहत उसकी करो ...........
जिसकी मंजिल का दामन तुम सजा सको !
                जिसका किनारा न हो वो चाहत नही .............लालच है !
तो जरा रुको यू ही न ये जीवन बर्बाद करो .............
                         खुद भी हसो औरों को भी हसने दो ............
ख़ुशी के नगमो से ये जीवन की बगिया सजने दो ,
                        चाहत उतनी की करो ! 
जिसमें  तुम और तुम्हारे कुटुम जी सकें ..........
                 वो चाहत क्यों करते हो जिसका अंत ही नही .......
आवों जरा तय तो  कर लो ...........
                           किसकी चाहत है और क्यों ??
 

Sunday, April 24, 2011

" जो आँखें हैं सब जानती हैं"



 ये जो आँखें है, सब जानती है"        
    ह्या की मेहँदी सी रंग बिखराती है, 
 पलकों के दामन में छुपकर हर बात कहती है,
  कभी तो बचपन की पायल सी छमछम कर के ,
  तोतली बोली से सब को   रिझाती है,
  और दुर कही  बाजड़े के खेतो में ,
                         धुप की चुनरी लिए  कौएँ  उराती है!
                            ये जो आँखें है सब जानती है!

           कभी तो चांदी की चमक बालो में सजाकर ,
           डूबी हुई पतवारों को तजुर्बे के,
                     काजल से किनारा दिखलाती हैं ,
                  ये जो आँखें है, सब जानती हैं!                           
              इतने पर भी इसे चैनं कहाँ  ?  
ये तो बावली बनकर कच्ची  मिट्टी  में घरौंदे तराशती हैं , 
 नाजुक नाजुक बेलों पर सपनो का जूरा बनाती हैं,
     ये जो आँखें है सब जानती हैं !

     इन  आँखो के गिरह में जीवन के भाव सिमटे हैं ,
    ग़र होना है इन आँखों के पार तो
   धीमे धीमे इन भावों को आपनी जीवन में उतारना, 
  क्योंकी  ये आँखें है, सब जानती हैं!