Wednesday, April 27, 2011

"जरा तय तो कर लो ".

 जरा तय तो कर लो , किसकी चाहत है तुम्हें?
जिसकी  खातीर चल पड़े हो, पगडंडी से होकर कोरी सड़क पर ,
हर लम्हा आपने जीवन का,  बिता  रहें हो ऐसे ........
                                                                  जैसे  थका  घोड़ा  रेस का !
   जरा तय तो कर लो किसकी चाहत है तुम्
               अच्छा छोडों, एक सवाल है जो जरा खुद से पुछो ??
        सुबह की  किरणों से लेकर,रात के फैले काजल तक "'
                                  ये जो तुम्हारी पलके हैं ,
                कब -कब मुस्कान से झपकती हैं?
                          अगर ऐसा नही है तो,,
 किसकी चाहत में तुम बनो हो रेस का घोड़ा  .........??
             अरे जरा सोचों चाहत उसकी करो ...........
जिसकी मंजिल का दामन तुम सजा सको !
                जिसका किनारा न हो वो चाहत नही .............लालच है !
तो जरा रुको यू ही न ये जीवन बर्बाद करो .............
                         खुद भी हसो औरों को भी हसने दो ............
ख़ुशी के नगमो से ये जीवन की बगिया सजने दो ,
                        चाहत उतनी की करो ! 
जिसमें  तुम और तुम्हारे कुटुम जी सकें ..........
                 वो चाहत क्यों करते हो जिसका अंत ही नही .......
आवों जरा तय तो  कर लो ...........
                           किसकी चाहत है और क्यों ??

"जरा तय तो कर लो ".

 जरा तय तो कर लो , किसकी चाहत है तुम्हें?
जिसकी  खातीर चल पड़े हो, पगडंडी से होकर कोरी सड़क पर ,
हर लम्हा आपने जीवन का,  बिता  रहें हो ऐसे ........
                                                                  जैसे  थका  घोड़ा  रेस का !
   जरा तय तो कर लो किसकी चाहत है तुम्
               अच्छा छोडों, एक सवाल है जो जरा खुद से पुछो ??
        सुबह की  किरणों से लेकर,रात के फैले काजल तक "'
                                  ये जो तुम्हारी पलके हैं ,
                कब -कब मुस्कान से झपकती हैं?
                          अगर ऐसा नही है तो,,
 किसकी चाहत में तुम बनो हो रेस का घोड़ा  .........??
             अरे जरा सोचों चाहत उसकी करो ...........
जिसकी मंजिल का दामन तुम सजा सको !
                जिसका किनारा न हो वो चाहत नही .............लालच है !
तो जरा रुको यू ही न ये जीवन बर्बाद करो .............
                         खुद भी हसो औरों को भी हसने दो ............
ख़ुशी के नगमो से ये जीवन की बगिया सजने दो ,
                        चाहत उतनी की करो ! 
जिसमें  तुम और तुम्हारे कुटुम जी सकें ..........
                 वो चाहत क्यों करते हो जिसका अंत ही नही .......
आवों जरा तय तो  कर लो ...........
                           किसकी चाहत है और क्यों ??
 

Sunday, April 24, 2011

" जो आँखें हैं सब जानती हैं"



 ये जो आँखें है, सब जानती है"        
    ह्या की मेहँदी सी रंग बिखराती है, 
 पलकों के दामन में छुपकर हर बात कहती है,
  कभी तो बचपन की पायल सी छमछम कर के ,
  तोतली बोली से सब को   रिझाती है,
  और दुर कही  बाजड़े के खेतो में ,
                         धुप की चुनरी लिए  कौएँ  उराती है!
                            ये जो आँखें है सब जानती है!

           कभी तो चांदी की चमक बालो में सजाकर ,
           डूबी हुई पतवारों को तजुर्बे के,
                     काजल से किनारा दिखलाती हैं ,
                  ये जो आँखें है, सब जानती हैं!                           
              इतने पर भी इसे चैनं कहाँ  ?  
ये तो बावली बनकर कच्ची  मिट्टी  में घरौंदे तराशती हैं , 
 नाजुक नाजुक बेलों पर सपनो का जूरा बनाती हैं,
     ये जो आँखें है सब जानती हैं !

     इन  आँखो के गिरह में जीवन के भाव सिमटे हैं ,
    ग़र होना है इन आँखों के पार तो
   धीमे धीमे इन भावों को आपनी जीवन में उतारना, 
  क्योंकी  ये आँखें है, सब जानती हैं!                                                       

Saturday, April 23, 2011

ग़ज़ल

    चाँद तनहा है, आसमा तनहा 
    चाँद तनहा है , आसमा तनहा .....
     बात निकली है जो दिल की तो दिल भी तनहा है |
     चाँद तनहा है .................
     इश्क की राह पर चल रहे है जो कदम ,
चल रहे है साथ मगर फीर भी तनहा .......         
 चाँद तनहा है ............
 आज भी हुश्न को देखकर शायरी कहते है क्या ?
  अब तो ग़ालिब की हवेली में ग़ालिब तनहा ............
 चाँद तनहा है ...........
  ओश की बूंद पर गर्म रेतो के निशा.......
तप रही है जम़ी प्यार की , और     ख्वाईशे  तनहा ...... 
चाँद तनहा है ...................