Sunday, April 24, 2011

" जो आँखें हैं सब जानती हैं"



 ये जो आँखें है, सब जानती है"        
    ह्या की मेहँदी सी रंग बिखराती है, 
 पलकों के दामन में छुपकर हर बात कहती है,
  कभी तो बचपन की पायल सी छमछम कर के ,
  तोतली बोली से सब को   रिझाती है,
  और दुर कही  बाजड़े के खेतो में ,
                         धुप की चुनरी लिए  कौएँ  उराती है!
                            ये जो आँखें है सब जानती है!

           कभी तो चांदी की चमक बालो में सजाकर ,
           डूबी हुई पतवारों को तजुर्बे के,
                     काजल से किनारा दिखलाती हैं ,
                  ये जो आँखें है, सब जानती हैं!                           
              इतने पर भी इसे चैनं कहाँ  ?  
ये तो बावली बनकर कच्ची  मिट्टी  में घरौंदे तराशती हैं , 
 नाजुक नाजुक बेलों पर सपनो का जूरा बनाती हैं,
     ये जो आँखें है सब जानती हैं !

     इन  आँखो के गिरह में जीवन के भाव सिमटे हैं ,
    ग़र होना है इन आँखों के पार तो
   धीमे धीमे इन भावों को आपनी जीवन में उतारना, 
  क्योंकी  ये आँखें है, सब जानती हैं!                                                       

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